आखिर परिवार की जंग सड़क पर क्यों?

उत्तर प्रदेश की वर्तमान राजनीतिक हालातों पर पूरे देशभर की नजर है, राजनीतिक दलों को ओर भी मजे आ रहे है, कि देखों अभी आगे-आगे क्या होता है और इसका फायदा कैसे तथा किस तरह से लिया जा सकता है। जो राजनीतिक दल मुलायाम सिंह एंड पार्टी के घोर विरोधी है, उन्होंने तो संभवतः ’जूते चप्पल भी उलटे’ कर दिये होंगे! खैर मुलायम सिंह के परिवार की जंग सड़क पर क्यों आ गई यह बात सोचनीय है।

बीते दिनों से मुलायम सिंह के परिवार में भड़का विवाद ज्वालामुखी का रूप धारण कर चुका है। यादव परिवार के अधिकांश प्रमुख सदस्य राजनीति में है और पाॅवर में होने के कारण अपनो पर ही दम ठोंक रहे है। मुख्यमंत्री के पाॅवर का उपयोग पहले भी अखिलेश ने किया था, लेकिन अब तो उन्होंने अपनी वाली पूरी तरह से चला दी है तो चाचा शिवपाल और पिता मुलायम को भी सम्पट नहीं बैठी। परिवार में भले ही सब एक हो और साथ में उठते बैठते हो लेकिन असल में सच तो यह है कि लड़ाई वर्चस्व की बनी हुई है।

वैसे भी राजनीति किसी की सगी नहीं होती है, यह बात प्राचीन समय में भी चरितार्थ होती रही है और वर्तमान में भी सामने आती रही है। राजनीति में साम दाम दण्ड भेद की पराकाष्ठा यदि चरम पर न पहुंचे तो फिर क्या राजनीति की आपने! मुलायम यादव के परिवार की बात हो तो महसूस होता है जरा सी बात का बतंगढ़ बना दिया गया लेकिन यही बतंगढ़ अब परिवार में दो फाड़ कर चुका है। चाचा भतीजे के मतभेद, मनभेद हो चुके है, ऐसे में कोई भी समझाने बुझाने का प्रयास करें, मन को बदला नहीं सकता। मुलायम सिंह को निश्चित ही परिवार की लड़ाई का टेंशन होगा और वे हर बार ही मामले को सुलटाने का प्रयास कर रहे है, बावजूद इसके प्रयास सार्थक होते नजर नहीं आते।

अब रही बात राजनीतिक दलों की तो वे तो यही चाहते है कि और लड़ो भिड़ो, ताकि आप अपने में ही उलझते रहे तथा हमें फायदा मिल जाये। यादव परिवार में रार भी उस वक्त पड़ी जब राज्य में चुनाव होना है। वैसे भी विरोधी राजनीतिक दलों को ऐसा मौका कब मिलता है जब सत्ता को दोबारा हांसिल करने की ताकत रखने वाले राजनीतिक दल में विवाद भड़क जाये !

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