आखिर क्यों इतिहास के पन्नों में नहीं है रानी लक्ष्मी बाई के वंशजों का जिक्र...?

इंदौर:  रानी लक्ष्मीबाई की अपने 8 वर्ष के बेटे दामोदर राव के साथ घोड़े की सवारी करने वाली तस्वीर, जिसे उन्होंने पीठ पर एक कपड़े से बांधा हुआ है, जो अंग्रेजों से युद्ध कर रही है, और यही छवि आज हर किसी के दिमाग में है। लेकिन अफसोस की बात है कि आजादी के पश्चात्  किसी भी सरकार ने इस प्रश्न का जवाब तलाशने का प्रयास नहीं किया। लक्ष्मीबाई की शहादत के बाद झांसी के नाबालिग राजकुमार के साथ क्या हुआ ?

इस बारें में तो केवल कुछ ही लोगों को मालूम होगा कि रानी के बेटे दामोदर राव और उनकी अगली 5 पीढ़ियों ने इंदौर में एक गुमनाम जीवन बिताया है, जो अहिल्या नगरी कहलाने पर गर्व कर रहे है। कोई सरकारी या सार्वजनिक सहायता नहीं मिलने की वजह से, रानी के वंशजों की पहली दो पीढ़ियों ने घोर गरीबी और किराए के घर में अपना सम्पूर्ण जीवन बिता दिया। इस बात में भी कोई शक नहीं है कि उनका पता लगाने के लिए किसी भी सरकार द्वारा आज तक प्रयास नहीं किया गया।

हकीकत तो यह है कि रानी के वंशज 2021 तक मध्य प्रदेश के इंदौर शहर में रह रहे थे।  जिसके बाद वह नागपुर जा बसे, जहां छठी पीढ़ी के वंशज अब एक सॉफ्टवेयर कंपनी में काम कर रहे है और एक गुमनाम जीवन जीना पसंद करते हैं। उन्होंने अपने नाम पर मॉनीकर झांसीवाले जोड़कर झांसी के साथ अपना जुड़ाव जिन्दा रखा है। सॉफ्टवेयर इंजीनियर योगेश अरुण राव झांसीवाले (44) रानी लक्ष्मीबाई के परिवार की छठी पीढ़ी के मेंबर है। वह वर्तमान में अपनी पत्नी प्रीत और दो बच्चों प्रीयेश और धनिका के साथ नागपुर में अपना जीवन बिता रहे है।

उनके साथ उनके पिता अरुण राव झांसीवाले भी रहते है। तत्कालीन एमपी बिजली बोर्ड (एमपीईबी) में सहायक अभियंता के पद से सेवानिवृत्त हुए अरुण राव इंदौर के धनवंतरी नगर में एक घर के मालिक हैं। दामोदर राव ने अपने बेटे लक्ष्मण राव झांसीवाले को पीछे छोड़ते हुए 20 मई, 1906 को 57 साल की आयु में आखिरी सांस ली, जिन्हें अंग्रेजों द्वारा प्रति माह 200 रुपये की पेंशन प्रदान की जाती थी। 

15 अगस्त 1947 को देश को स्वतंत्रता मिलने के पश्चात तत्कालीन सरकार ने लक्ष्मण राव को रेजीडेंसी क्षेत्र में घर खाली करने के लिए बोला था।  रानी लक्ष्मीबाई के वंशजों के पास इंदौर के रजवाड़ा के पीरगली इलाके में किराए के मकान में शिफ्ट होने के अलावा कोई ऑप्शन नहीं था। इस बारें में भी बहुत कम लोगों को जानकारी होगी कि झांसी की रानी के पोते ने जिला अदालत में एक स्वतंत्र टाइपिस्ट के रूप में कार्य कर चुके है। गरीबी की वजह से परिवार हमेशा खाली पेट सोता था। उन्होंने 1959 में बेटे कृष्णा राव झांसीवाले और बेटी चंद्रकांता बाई को छोड़कर अत्यधिक गरीबी में इस दुनिया को छोड़कर चले गए।

रानी लक्ष्मी बाई के परपोते कृष्णा राव इंदौर के हुकुमचंद मिल में स्टेनो-टाइपिस्ट के रूप में कार्य करते थे। उन्हें केंद्र और यूपी सरकार की ओर से हर माह 100 रुपये पेंशन दी जाती थी। अपना पूरा जीवन उसी किराए के घर में बिताने के बाद 1967 में कृष्णा राव का देहांत हो गया। उनके निधन के पश्चात् केंद्र और यूपी सरकार ने रानी के वंशजों की पेंशन बंद कर दी। उनके बेटे अरुण राव झांसीवाले एक इंजीनियर थे और MPEB में शामिल हुए थे। वर्ष 1994 में उन्होंने इंदौर के धनवंतरी नगर में एक घर खरीद लिया। दरअसल, रानी के बेटे दामोदर राव के साथ झांसी छोड़ने के उपरांत, परिवार को एक घर के लिए 5 पीढ़ियों तक प्रतीक्षा करनी पड़ी।  अरुण राव झांसीवाला (नीला कुर्ता) अपने बेटे योगेश राव झांसीवाला (लाल कुर्ता) के साथ अपनी बहू प्रीत और अपने दो बच्चों प्रीयेश और धनिका राव झांसीवाला के साथ रहते है।

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