एक तस्वीर पर इतना विवाद, आखिर थे क्या जिन्ना ?

देश में जब भी चुनाव होता है, हर बार कोई नया 'जिन्ना' खड़ा हो जाता है और हम बाकि सब कुछ भूलकर सिर्फ उस 'जिन्ना' के पीछे लग जाते हैं. जैसे की अभी लगे हुए हैं. हमारे देश की विडम्बना ही यही है कि हम हर मुद्दे को तत्काल भगवा और हरे में बाँट देते हैं. जिन्ना को लेकर भी यही हो रहा है. लेकिन जिसकी एक तस्वीर को लेकर इतना विवाद मचा हुआ है, उसके बारे में हम जानते कितना हैं ? तो आइए जानते हैं कुछ जिन्ना के बारे में. कहानी शुरू होती है जिन्ना के दादाजी प्रेमजीभाई मेघजी ठक्कर से, जो लोहाना जाति के थे और  गुजरात के कठियावाड़ के पनेली गांव के रहने वाले थे.

अब चूंकि दादाजी मछली का व्यापर करते थे और काफी इसमें उन्होंने काफी पैसा भी कमाया लेकिन मछली का व्यापर करने के कारण उन्हें जाति से बाहर कर दिया जाता है. नतीजा यह होता है कि उनके बेटे पुंजलाल ठक्कर (जिन्ना के पिता) का जवान खून इस अपमान को बर्दाश्त नहीं कर पाता और वह अपने चार बेटों समेत इस्लाम क़ुबूल कर लेता है. इसके बाद जिन्ना लंदन में बैरिस्टरी की शिक्षा पूरी करता है और देश लौटकर बॉम्बे हाईकोर्ट में वकालत करने लगता है. तीव्र बुद्धि वाले जिन्ना को जल्द ही वे लोग पसंद करने लगते हैं, जिन्हे अंग्रेज़ों से छुटकारा चाहिए. इसी के चलते उन्हें कांग्रेस में जगह मिल जाती है. जहाँ वे हिन्दू- मुस्लिम एकता कि पुरज़ोर वकालत करते हैं. यह वह समय है जब नेहरू राजनीति का ककहरा सीख रहे हैं और दूसरी तरफ जिन्ना, बाल गंगाधर तिलक और गोपाल कृष्ण गोखले, देश की आजादी के मसूबों पर काम कर रहे हैं. यहाँ तक तो जिन्ना से किसी को कोई आपत्ति नहीं होगी. इसके बाद 1920 में अपने देश का स्वाधीनता आंदोलन छोड़कर लंदन लौट जाते हैं और वहां वकालत करने लगते हैं.

लंदन से 14 साल का वनवास बिताकर जब जिन्ना वापिस लौटते हैं, तब जिन्ना का दूसरा चेहरा सामने आता है. इन 14 सालों में अंग्रेज़ों के 'फूट डालो शासन करो' नीति से भारत की हिन्दू-मुस्लिम एकता तार-तार होने लगती है. लेकिन अब जिन्ना इसमें दिलचस्पी नहीं लेता, वह नाम से भले ही मुसलमान है लेकिन शराब पीता है, सूअर का मांस खाता है, फिर भी कट्टरपंथी मुसलमान उसे कन्धों पर बिठाकर घूम रहे हैं. क्योंकि वे जानते हैं कि यही जिन्ना किसी दिन बाज़ी उनके हक़ में पलट सकता है. जिस कांग्रेस के मंच से कभी जिन्ना ने हिन्दू-मुस्लिम एकता को मज़बूत किया था, अब वह उसे हिन्दू-दल कहता है और मुसलमानों के लिए एक अलग देश की मांग कर बैठता है.  नतीजा आपने कई फिल्मों में देखा ही होगा, 'बंटवारा.' हर भारतीय को इससे सीख लेनी चाहिए कि धर्म और बंटवारे की सियासत के क्या नतीजे होते हैं. सच तो यह है कि जिन्ना का विरोध ज़रूर होना चाहिए, जब ज़रूरत पड़े तब होना चाहिए, लेकिन इस विरोध में इस बात का ध्यान रखना भी ज़रूरी है कि कहीं विरोध के इस रास्ते पर चलते हुए कहीं हम जिन्ना के नक्शे-कदम पर ही तो नहीं चलने लगे हैं.

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