शुक्र गृह से सम्बधित इस पौराणिक कथा से बहुत कम ही लोग परिचित हैं

ज्योतिषशास्त्र वह माध्यम है, जो मानव के स्वभाव, भविष्य व समस्त समस्याओं के समाधान के बारे में बताता है। ज्योतिषशास्त्र के माध्यम से मानव का जीवन ब्रम्हाण्ड में मौजूद गृहो से प्रभावित होता है। यह गृह व्यक्ति कि कुंडली को भी प्रभावित करते हैं और इन्ही के कारण मानव का जीवन भी प्रभावित होता है। खास बात तो यह है कि इन समस्त गृहों कि अपनी अलग ही मान्यता है, जिसमें अगर शुक्र गृह की बात करें, तो यह अपने आप में अनुठा गृह है। आज हम आपसे शुक्र गृह से संबधित एक ऐसी पौराणिक कथा के बारे में बताने जा रहे हैं, जिससे शुक्र गृह के प्रभाव के बारे में जानकारी मिलती है। तो चलिए जानते हैं उस कथा के बारे में....

शुक्र महर्षि भृगु के पुत्र हैं। जिस तरह देवों के गुरु बृहस्पति हैं, ठीक उसी तरह शुक्र दानवों के गुरु हैं। इसलिए बृहस्पतिदेव से शुक्र की कभी नहीं बनती है। शुक्र असुरराज बली के गुरु थे। इनकी पत्नी का नाम सुषमा और पुत्री का नाम देवयानी था। हरवंश पुराण में वर्णित है कि एक बार शुक्र ने भगवान शिव से पूछा कि असुर, देवताओं से कैसे सुरक्षित रह सकते हैं? तब शिव ने उन्हें तप का मार्ग बताया। शुक्र तप के लिए वन चले गए। उन्होंने कई वर्षों तक तप किया।

जब शुक्र तप कर रहे थे। उस दौरान धरती पर देवताओं और असुरों का युद्ध हुआ। देवासुर संग्राम में विष्णु जी ने शुक्र की माता का वध किया। जब शुक्र तप करके लौटे, उन्होंने वरदान स्वरूप शिव से मृत संजीवनी मंत्र की दीक्षा प्राप्त की थी। जिससे वो मृत व्यक्ति को जीवित कर देते थे। उनकी मां मर चुकी है, जब यह बात शुक्र को पता चला तो उन्होंने भगवान विष्णु को शाप दिया कि वह पृथ्वी पर 7 बार मानव रूप में जन्म लेंगे।

लेकिन यही शाप श्रीहरि के लिए वरदान बना और दैत्यों के लिए शाप। सात बार मानव रूप में जन्म लेकर श्रीहरि ने अत्याचारी दैत्यों का संहार किया। शुक्र ने श्रीहरि को शाप देने के बाद मृतसंजीवनी विद्या से सभी मृत दानवों और अपनी मां को जीवित किया। यही विद्या शुक्र ने पुत्री देवयानी के माध्यम से कच को सिखाई थी। लेकिन इस बार पुनः शुक्र ने तप किया।

तप को भंग करने के लिए इंद्र ने अपनी पुत्री जयंती को भेजा। लेकिन वह शुक्र के तप को भंग नहीं कर सकीं। तप के बाद शुक्र ने इंद्र की पुत्री जयंती से विवाह कर लिया था। शुक्र जिन्हें शुक्राचार्य भी कहा जाता था एक बेहतर राजनीतिज्ञ थे। इस बात का उल्लेख हिंदू पौराणिक ग्रंथों में मिलता है। शुक्रचार्य ने 'शुक्रनीति' नाम से एक ग्रंथ की रचना की थी।

 

पुरातन काल में निर्मित ये चीजें मानव जीवन की किस्मत को ही बदल देती है

तो इसलिए भगवान विष्णु को हरि नाम से भी जाना जाता है

गुरुद्वारा में जाने से पहले इसलिए ढका जाता है सिर

आखिर कैसे हुई थी आचार्य चाणक्य की मृत्यु ?

 

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