भगवान की स्तुति करने का सबसे उत्तम समय है ये

 

व्यक्ति अपने जीवन में जाने-अनजाने जो कर्म करता है, उसका फल उसे अवश्य मिलता है. यदि व्यक्ति अनजाने में कोई बुरा कर्म करता है, तो उसका फल भी बुरा ही मिलता है. किन्तु यदि व्यक्ति अपने जीवन में संध्यावंदन करता है, तो उसके   पूरे दिन के पाप समाप्त हो जाते है. आइये संध्यावंदन के विषय में विस्तार से जानते है.

संध्यावंदन का अर्थ- सूर्यास्त के बाद का समय संध्या कहलाता है, इस समय न दिन होता है और न ही रात होती है. इस समय की गई पूजा ही संध्यावंदन कहलाती है. व्यक्ति के जीवन में संध्यावंदन का बहुत महत्व है, इसके महत्व का वर्णन वेद, पुराण, रामायण, महाभारत आदि ग्रंथों में दिया गया है. संध्यावंदन करने से व्यक्ति के अन्दर सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है और उसके जीवन के कई रोग दूर हो जाते है. संध्यावंदन पांच प्रकार से किया जा सकता है प्रार्थना, ध्यान, कीर्तन, यज्ञ और पूजा आरती.

प्रार्थना- प्रार्थना का अर्थ है, कि भगवान के समक्ष खड़े होकर अपने दोनों हांथ जोड़कर, उनके प्रति कृतज्ञता का भाव व्यक्त करना और उन्हें आभार व्यक्त करना, प्रार्थना सभी धर्मों में की जाती है बस इसके करने का तरीका बदल जाता है.

ध्यान लगाना- ध्यान कई प्रकार से लगाया जाता है, जैसे अपनी आँखें बंद करके ईश्वर को याद करना या माला के साथ ईश्वर को याद करके उनका नाम जपना, व्यक्ति के ध्यान करने से उसका मन शांत होता है और वह अपने विचारों को अपने काबू में कर सकता है.

कीर्तन करना- संगीत के माध्यम से अपने ईश्वर का नाम लेना व उनका आभाव व्यक्त करना कीर्तन कहलाता है. इसे समूह में किया जाता है, जिसे करने से व्यक्ति को आत्म सुख की प्राप्ति होती है.

यज्ञ हवन- हमारे वेदों में यज्ञ के पांच प्रकार बताये गए है ब्रह्मयज्ञ, देवयज्ञ, पितृयज्ञ, वैश्वदेव यज्ञ और अतिथि यज्ञ इन यज्ञों के माध्यम से आप अपनी मनोकामना को पूर्ण कर सकते है.

पूजा-आरती- यह भी ईश्वर को याद करने का एक माध्यम है, जिसे करके व्यक्ति उनका आभार व्यक्त करता है. इसके करने से वातावरण में सकारात्मक ऊर्जा उत्पन्न होती है और मन को शांति प्राप्त होती है.

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