कैदियों की रिहाई ना होने पर सुप्रीम कोर्ट के सवाल


उत्तरप्रदेश: जिला विधिक सेवा अथॉरिटी के सदस्य सचिव की सिफारिशों को स्वीकार ना करने पर सुप्रीम कोर्ट ने उत्तर प्रदेश सहित तीन राज्यों से सवाल किया है कि आखिर जेल में बंद विचाराधीन कैदियों की रिहाई क्यों नहीं हुई, जबकि उन्हें रिहा करने की सिफारिश की गई थी, ये सभी वे विचाराधीन कैदी हैं जो आधी सजा काट चुके हैं.

न्यायमूर्ति मदन बी लोकुर की अध्यक्षता वाली पीठ ने  बीते दिन उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र और मध्य प्रदेश सरकार को 10 दिनों के भीतर हलफनामा दायर कर यह बताने को कहा है कि आखिरकार जिला विधिक सेवा अथॉरिटी के सदस्य सचिव और अंडरट्रायल रिव्यू कमेटी की सिफारिशों के बाद भी कैदियों को क्यों रिहा नहीं किया गया. साथ ही पीठ ने सख्ती से पेश आते हुए कहा कि उन्हें 25 अक्टूबर तक हलफनामा पेश करना होगा, और इसकी समय सीमा को नहीं बढ़ाया जाएगा. उसके बाद कोर्ट ने यह भी कहा कि अगर राज्य सरकारों द्वारा संतोषजनक जवाब नहीं मिला तो उस स्थिति में राज्यों के मुख्य सचिवों को भी समन किया जा सकता है.

कोर्ट ने कहा कि हम इसलिए यह आदेश पारित कर रहे हैं कि राष्ट्रीय विधिक सेवा अथॉरिटी (नालसा) के हलफनामे में जो आंकड़े पेश किए गए है वह हैरत करने वाला है. पीठ ने पाया कि कई मौके पर जिला विधिक सेवा अथॉरिटी के सदस्य सचिव और अंडरट्रायल रिव्यू कमेटी की सिफारिशों से कैदी रिहा किए गए. पीठ ने राज्य सरकारों से हलफनामे में इसका कारण भी बताने के लिए कहा है. जिसकी अगली सुनवाई 31 अक्टूबर को होगी.
 

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