पद्मिनी एकादशी 2018 - पुरुषोत्तम मास में होने वाले पद्मिनी एकादशी व्रत की कथा

अधिकमास में शुक्ल पक्ष की एकादशी को पद्मिनी एकादशी या कमला ग्यारस के रूप में मनाया जाता है. ऐसी मान्यता है कि जिस साल भी मलमास या अधिकमास आता है उस साल इस व्रत को किया जाता है और इसके प्रभाव से व्रती को बैकुंठधाम की प्राप्ति होती है.

पद्मिनी एकादशी की कथा : पूर्वकाल में त्रेयायुग में हैहय नामक राजा के वंश में कृतवीर्य नाम का राजा महिष्मती पुरी में राज्य करता था.उस राजा की 1,000 परम प्रिय स्त्रियां थीं, परंतु उनमें से किसी को भी पुत्र नहीं था, जो की उनके राज्यभार को संभाल सके. देव‍ता, पितृ, सिद्ध तथा अनेक वैद्यों आदि से राजा ने पुत्र प्राप्ति के लिए काफी प्रयत्न किए, लेकिन असफलता ही प्राप्त हुई.तब राजा ने तपस्या करने का निश्चय किया. महाराज के साथ उनकी परम प्रिय रानी, जो इक्ष्वाकु वंश में उत्पन्न हुए राजा हरिश्चंद्र की पद्मिनी नाम वाली कन्या थीं, राजा के साथ वन में जाने को तैयार हो गई. दोनों अपने मंत्री को राज्यभार सौंपकर राजसी वेष त्यागकर गंधमादन पर्वत पर तपस्या करने चले गए. 
 
राजा ने उस पर्वत पर 10 हजार वर्ष तक तप किया, परंतु फिर भी पुत्र प्राप्ति नहीं हुई. तब पतिव्रता रानी कमलनयनी पद्मिनी से अनुसूया ने कहा- 12 मास से अधिक महत्वपूर्ण मलमास होता है, जो 32 मास पश्चात आता है. उसमें द्वादशीयुक्त पद्मिनी शुक्ल पक्ष की एकादशी का जागरण समेत व्रत करने से तुम्हारी सारी मनोकामना पूर्ण होगी. इस व्रत के करने से भगवान तुम पर प्रसन्न होकर तुम्हें शीघ्र ही पुत्र देंगे.


 
रानी पद्मिनी ने पुत्र प्राप्ति की इच्छा से एकादशी का व्रत किया. वह एकादशी को निराहार रहकर रात्रि जागरण कर‍ती. इस व्रत से प्रसन्न होकर भगवान विष्‍णु ने उन्हें पुत्र प्राप्ति का वरदान दिया. इसी के प्रभाव से पद्मिनी के घर कार्तवीर्य उत्पन्न हुए. जो बलवान थे और उनके समान तीनों लोकों में कोई बलवान नहीं था. तीनों लोकों में भगवान के सिवा उनको जीतने का सामर्थ्य किसी में नहीं था.
 
अतः जिन मनुष्यों ने मलमास शुक्ल पक्ष एकादशी का व्रत किया अथवा जो संपूर्ण कथा को पढ़ते या सुनते हैं, वे भी यश के भागी होकर विष्‍णुलोक को प्राप्त करते हैं.

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