पत्रकार पर हमला लोकतंत्र के लिये खतरा

कल रात रेडियो पर दिलीप कुमार साहब का वीर रस से भरा एक गीत सुन रहा था कि (अपनी आज़ादी को हम हरगिज़ मिटा सकते नही सर कटा सकते हैं लेकिन सर झुका सकते नही ) तभी टीवी के एक न्युज चैनल पर निगाह गई जहाॅ पत्रकार गौरी लंकेश की हत्या और पत्रकार की सुरक्षा पर वाद विवाद हो रहा था। कितना अद्भूत संयोग है की गाना और बहस दोनो का मुद्दा एक ही है। और वो है स्वतंत्रता अभिव्यक्ति की। या युं कह ले कि दोनो मे समानता केवल ही थी, कि दोनो के दोनो हमारे भारतीय संविधान मे स्वतंत्रता का अधिकार जो हमारे मूल अधिकारो में सम्मिलित है और जिसकी 19,20,21 और 22 क्रमांक की धाराएॅ नागरिकों को बोलने और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के साथ 6 प्रकार की स्वतंत्रता प्रदान करती है जिसे हर भारतीय का जन्म सिद्ध अधिकार बताया गया है,उसी का गौरवगान कर रहे थे। यहाॅ ये उल्लेख करना जरूरी था क्योकी हम बात कर रहे है एक पत्रकार की, जो व्यवथापिका न्यायपालिका और कार्यपालिका के बाद भारतीय लोकतंत्र का चैथा स्तंभ है। 

पत्रकार को, समाज का दर्पण भी कहा जाता है वो इसलिये,क्योकी जो समाज मे चल रहा है पत्रकार उसका मूल्यांकन करता हैं और समाज मे उससे संबधित सत्य को पहुंचाता है पर जब वही दर्पण, कुछ विकृत मांसिकता वाले हथियारो से चकनाचूर होने लगे तो ये सवाल ज़ेहन मे उठना लाज़़मी है कि जब कलमकार को ही, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता नही है तो आम जनता को कैसे मिलेगी?

खैर आईये अब बात करे मंगलवार रात 8 बजे बेंगलुरु मे हुई वरिष्ठ पत्रकार गौरी लंकेश की निर्मम हत्या की, तो गौरी लंकेशअपनी साप्ताहिक पत्रिका (लंकेश पत्रिके )मे जिस निर्भीकता और बेबाकी से लिखती थी वो कट्टरपंथी विचारको और साम्प्रदायिक राजनीति पर घोर कुठाराघात होता था वो हमेषा आम जनता के पक्ष को लिखती थी जो शायद कर्नाटक के धर्मवादी राजनेताओ और कट्टरपंथी संगठनो को नागवार था यही कारण था कि उन्हे पिछले कुछ समय से लगातार जान से मारने की धमकियां मिल रही थी लेकिन कहते की सागर की लहर और पत्रकार की कलम को कोई नही रोक सकता । वो लगातार लिखती रही,लेकिन गौरी लंकेश की जिस तरह हत्या हुई है वो हमे तालिबानियो द्वारा अपहरण और हत्या किये गये अमेरिकी पत्रकार की घटना याद दिलाती है । 

वैसे आज केवल पत्रकार ही है, जो 1 रूपये के पेपर से लेकर 350 रू महीने के सेट टाॅप बाॅक्स के द्वारा, समाज में होने वाले गलत के खिलाफ जन आक्रोष की चिंगारी फूंकता है पंरतु जब वही पत्रकार,कट्टरपंथियो का शिकार हो जाता है तो समाज मे एक आम आदमी के हक और सच्चाई की लड़़ाई कौन करेगा इस विषय पर हम सभी को गंभीरता से विचार करना होगा? बिहार मे जब राजद समर्थको द्वारा अपने आकाओं के आदेष पर मीडिया कर्मियों पर प्रहार हुये जिसे सारी दूनियाॅ ने देखा भी, तभी से पत्रकारो की सुऱ़क्षा और स्वंत्रतता पर बहस छिड़़ी थी और गौरी लंकेष की हत्या ने उस आग मे घी का काम किया है ।

आज सारे देष मे पत्रकार संगठनो द्वारा इस हत्या का विरोध किया जा रहा है और राज्य के मुख्यमंत्री सिध्दारमैया ने भी मामले की गंभीरता को देखते हुये जांच के लिये विषेष टीमों का गठन किया है पंरतु सोचना ये है की जीएसटी और नोटबंदी पर तुरंत निर्णय लेने वाली सरकार लोकतंत्र के चैथे स्तंभ को बचाने के लिये भी कोई कदम उठायेगी या गौरी लंकेश की हत्या भी हमेषा की तरह संपादकीय काॅलम, ज्ञापन, केंडल मार्च, व्हाट्सप, फेसबुक के इंकलाबी मेसेजो और टीवी चेनलो के वाद विवाद तक ही सिमित रह जायेगी ये आपको और हमको सोचना हैं, क्यो की एक भारतीय नागरिक के रूप मे मैं इस बात से भयभीत हु कि जब पत्रकार को संविधान के अनुच्छेद 19 मे विर्णित अभिव्यक्ति का अधिकार नही मिल पा रहा हैं तो मेरा क्या होगा ये एक सवाल है जो मै आपके समक्ष छोड़ रहा हुुं। जवाब जरूर तलाशियेगा ।

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