नाम कोई मुझको दे दो, भूखे भक्षकों को अंजाम कोई दे दों

दर्द से कराहती चित्कार जिसके भी कानों तक पड़ती है वह सिहर उठता है। वह अपने ही मन को झकझोरकर सवालों के द्वंद्व में घिर जाता है। आखिर ऐसा क्यों। इस क्यों के फेर में पड़कर सवाल दर सवाल खड़े होते हैं मगर समाधान कहीं नहीं मिलता। हम बात कर रहे हैं निर्भया के दर्द की। जिसे 16 दिसंबर की रात बलात्कार का शिकार होना पड़ा। बलात्कार ही नहीं इसे वहशी युवाओं ने अपनी हवस का शिकार बनाने के बाद निर्ममतापूर्वक मार दिया। चलती बस में बलात्कार का युवती शिकार हुई और बाद में तड़प - तडपकर इसने दम तोड़ दिया। चार वर्ष बीत चुके हैं इस घटना को अभी भी याद किया जाता है। चार वर्षों के इस अंतराल में इस केस के नाबालिग आरोपी को सज़ा दी जा चुकी है और अपनी सज़ा समाप्त कर वह जेल से छूट भी चुका है लेकिन इसके बाद भी एक सवाल यह कौंधता है कि दोषियों को सज़ा के ऐलान के बाद भी मुंबई के शक्तिमील गैंग रेप का मामला, दिल्ली में चलती कैब में बलात्कार का मसला।

भारत के किसी गांव में सामूहिक बलात्कार का मामला हो या फिर सांसद मुलायम सिंह जैसे कद्दावार नेताओं की रेप को लेकर फिसलती जुबान हो। इन सभी का सिलसिला बदस्तूर जारी है। निर्भया कांड की चौथीं बरसी पर हमें यह विचार करना होगा कि आखिर इसका समाधान क्या है। इन घटनाओं का अंत क्या है। जुवेनाईल जस्टिस की बात इसमें भी हुई मगर क्या वास्तव में निर्भया, समाज और उस बालक के साथ न्याय हुआ जो इस कांड में दोषी था। समाज और निर्भया के माता-पिता उसके इस कृत्य के लिए फांसी की मांग करते रहे। मीडिया में भी यह मसला तब तक हावी रहा जब तक टीआरपी का सिक्का खन-खन बोलता रहा। मगर इसके बाद इसे भूला दिया गया। अब हर वर्ष इसकी बरसी मना ली जाती है मगर यह विचार नहीं किया जाता कि समाज में फैले बलात्कारी राक्षस का अंत कैसे किया जाए। जिस नाबालिग को इस वारदात में सज़ा दी गई। वह आतंकियों के संपर्क में आ गया। अब उसके व्यवहार पर किसी ने ध्यान नहीं दिया है। जबकि वह जेल से मुक्त हो चुका है तब उस पर ध्यान दिया जाना अधिक जरूरी है कि क्या वह इससे और अधिक खतरनाक अपराधी तो नहीं बन गया है। यदि ऐसा है तो उसका सुधारीकरण किया जाना जरूरी है।

अक्सर आपने केंद्रीय जेलों के बाहर कुछ पंक्तियां लिखी देखी होंगी। उन पंक्तियों में यह लिखा गया था कि अपराध से घृणा करें अपराधी से नहीं। इस तरह से समाज में बदलाव लाया जा सकता है। हां, यदि किसी की लड़की, किसी निर्भया की बात हो रही हो तब तो उसके साथ भी न्याय होना चाहिए। मगर क्या किसी को फांसी पर लटकाकर या आजीवन कारागार में डालकर निर्भया के साथ न्याय हो सकेगा। देश में निर्भया जैसे कितने ही मामले सामने आ चुके हैं मगर हर बार एक दर्द भरी चीख के बाद खामोशी छाने लगती है। आखिर ऐसा क्यों होता है। क्या इस तरह की वारदातों को लेकर कोई अध्ययन हो पाया है। क्या कार्यपालिका में इस बात की ग्यारंटी मिल सकी है कि इस तरह के मामले अब नहीं होंगे।

निर्भया के बाद पंजाब के मोंगा में चलती बस में एक लड़की को इस तरह की वारदात के बाद उसकी मां के साथ फैंक दिया गया। यही नहीं देश के एक अन्य स्थान पर बस में बलात्कार की घटना हुई। आखिर ऐसा कब तक चल सकता है। जब भी इस तरह की बातें सामने आती हैं पुलिस पर सवाल उठने लगते हैं। मगर पुलिस भगवान के घर से उतरकर जमीन पर नहीं आई है। यह भी हमारे समाज का ही एक अंग है। पुलिस अपना कार्य समाज में रहकर समाज की सहायता से ही करती है। ऐसे में पूरी तरह से उसकी कार्यप्रणाली को दोष दिया जाना सही नहीं है।

हां, मगर यह भी आवश्यक है कि पुलिस तंत्र में होने वाले लिंगभेद और उत्पीड़न के मामले दूर होने चाहिए। जब पुलिस इस तरह की बातों से मुक्त हो सकेगी तभी वह समाज में होने वाली ऐसी वारदातों का सामना कर पाएगी। निर्भया को न्याय तभी सुलभ होगा जब इस देश में कहीं भी बलात्कार और इस वारदात के बाद हत्या जैसी नृशंस घटनाऐं नहीं होंगी। इसके लिए फांसी या फिर जेल एक मात्र विकल्प नहीं है। ऐसे दोषियों को उन केंद्रों पर भेजा जाना चाहिए। जहां इनके व्यवहार में परिवर्तन होना जरूरी है।

निर्भया कहो या दामिनी कहो
या नाम कोई मुझको दे दो
जो भूखे भक्षक थे मेँरे
अंजाम कोई उनको दे दो
मुझे वीर कहो या बेचारी
या पापिन कह बदनाम करो
पर नारी से ही जन्मेँ हो
इस कोख का तो कुछ मान करो
मैँ तो बस एक दुर्घटना हूँ
सब भूल ही जायेँगे
बस कोई बता दे हम कब तक अबला कहलायेँगे

कहा- तुझसे शादी कर लूंगा और फिर हर दिन लूटता रहा उसकी इज्जत

नाबालिग के मुंह में रुमाल ठूंस दिया...

कहा नोकरी लगवा दूंगा और फिर कमरे ले...

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