किसी ने खाई लाठियां, तो किसी ने चूमा फांसी का फंदा.., हमें यूँ ही नहीं मिली आज़ादी

मंगल पांडेय को देश का पहला स्वतंत्रता सेनानी माना जाता है उन्होंने 1857 में अंग्रेज़ों के विरुद्ध क्रांति का बिगुल फूंका था

झांसी की रानी लक्ष्मीबाई को कौन नहीं जानता अपने पुत्र दामोदर को पीठ पर बांधे उनकी तस्वीर आज भी वीरता का प्रतिक मानी जाती है

आज़ाद ही रहे हैं आज़ाद ही रहेंगे चंद्रशेखर मरते दम तक आज़ाद ही रहे और कभी अंग्रेज़ों के हाथ नहीं आए

बहरों को सुनाने के लिए धमाके की जरुरत पड़ती है महज 23 वर्ष की आयु में भगत सिंह ने हँसते हँसते फांसी को गले लगा लिया था

ब्रिटिश सरकार का विरोध करते समय लाला लाजपत राय अंग्रेज़ों की लाठियों से घायल हो गए थे और कुछ दिनों बाद उनकी मौत हो गई थी

खुदीराम बोस देश के लिए फांसी चढ़ने वाले सबसे युवा क्रांतिकारी थे जिन्हे 18 साल की आयु में ही अंग्रेज़ों ने फांसी दे दी थी

मैनपुरी व काकोरी काण्ड जैसी घटनाओं को अंजाम देने के कारण ब्रिटिश हुकूमत ने 30 साल की उम्र में रामप्रसाद बिस्मिल को फांसी दे दी थी

काकोरी रेल डकैती में संलिप्तता के कारण अंग्रेज़ों ने अशफ़ाक़ुल्लाह खान को फांसी पर चढ़ा दिया था उस वक़्त उनकी उम्र महज 27 वर्ष थी

नेताजी सुभाष चंद्र बोस ने अकेले ही आज़ाद हिन्द फ़ौज बनाकर अंडमान निकोबार को अंग्रेज़ों से आज़ाद करा लिया था

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