विवादों में घिरा सिद्धारमैया का लिंगायत फैसला

बंगलुरु: लिंगायत मत भारतवर्ष के प्राचीनतम सनातन हिन्दू धर्म का एक हिस्सा है इस मत के ज्यादातर अनुयायी दक्षिण भारत में हैं, इसी के चलते दो दिन पहले लिंगायत समुदाय के लोगों की मांग को देखते हुए कर्नाटक के मुख्यमंत्री सिद्धारमैया ने लिंगायत को अलग धर्म की मान्यता देने का फैसला सुनाया था. लेकिन  राज्य के वीरशैव और लिंगायतों की मुख्य सामाजिक और धार्मिक संस्था वीरशैवई लिंगायत महासभा ने राज्य सरकार के इस फैसले पर यह कहते हुए सवाल उठाया है कि इससे समाज में अलगाव की स्थिति उत्पन्न हो सकती है.

यहां ये बात भी उल्लेखनीय है कि लिंगायत समुदाय के लोग राज्य की जनसंख्या के 17 फीसदी हैं. माना जाता है कि ये समुदाय बीजेपी के प्रति रूझान रखता है. राज्य में लिंगायत के सबसे बड़े नेता बीएस येदियुरप्पा हैं, जोकि राज्य के पूर्व मुख्यमंत्री भी रह चुके हैं. आगामी विधानसभा चुनावों में येदियुरप्पा बीजेपी की ओर से मुख्यमंत्री पद के उम्मीदवार हैं. इसीलिए इस मुद्दे ने राजनीतिक चोला भी पहन लिया है, जिसके बाद वरिष्ठ कांग्रेस विधायक और पूर्व मंत्री शमनुरू शिवशंकरप्पा ने इस मुद्दे पर पार्टी से अलग राग अलापा है. कांग्रेस नेता ने कहा कि कर्नाटक सरकार ने वीरशैवई समुदाय के साथ अन्याय किया है. वहीं भाजपा ने इसे वोट बैंक की राजनीति करार देते हुए कहा है कि कांग्रेस सरकार का ये फैसला राजनीतिक रूप से प्रेरित है, 

शिवशंकरप्पा ने कहा, 'सरकार ने हमारे साथ अन्याय किया है. वीरशैव और लिंगायत एक ही धर्म हैं. मंगलवार को लिए गए कैबिनेट के फैसले का मैं समर्थन नहीं करता हूं.' बता दें कि लिंगायत और वीरशैव समुदाय के लोग शिव की उपासना करते हैं. लेकिन दोनों समुदाय के कुछ लोगों का मानना है कि उनका धर्म अलग है.

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