आखिर कौन है जिम्मेदार?

हमारे यहां हर बात की जिम्मेदारी तय होती है। इस काम के लिए यह जिम्मेदार, कोई काम नहीं बना, तो वो जिम्मेदार। जिम्मेदार की जिम्मेदारी भी होती है और जिम्मेदारी का हर कोई जिम्मेदार होता है। अब अगर घर में कोई सामान नहीं है, तो पत्नी पति को जिम्मेदार मानती है और पति पत्नी को जिम्मेदार बताता है। बच्चे ने पढ़ाई नहीं की, नंबर कम आए, तो बच्चा जिम्मेदार और बच्चा स्कूल को जिम्मेदार बताता है। पिता मां को जिम्मेदार बताते  अपनी जिम्मेदारी से पीछे हटता है, तो मां पिता को बच्चे पर ध्यान न देने का जिम्मेदार मानती है। यह सारी जिम्मेदारी जिम्मेदार का इंतजार करती है और जिम्मेदार जिम्मेदार को खोजता रहता है।   

इतना ही नहीं कभी कुछ गलत हुआ, तो भगवान जिम्मेदार या किस्मत जिम्मेदार होती है। कभी कर्म जिम्मेदार, तो कभी परिवार जिम्मेदार और कभी—कभी सरकार भी जिम्मेदार।  यानी सबकी जिम्मेदारी तय है, लेकिन कोई भी जिम्मेदारी नहीं ले रहा है। अब ऐसा ही कुछ अमृतसर ट्रेन हादसे में भी हो रहा है। हर कोई जिम्मेदार है और कोई भी जिम्मेदार नहीं है। कुछ लोग सरकार को जिम्मेदार ठहरा रहे हैं और अब सरकारें दो हैं केंद्र और राज्य तो दोनों पक्ष के लोग विपक्षी सरकार को जिम्मेदार मान रहे हैं। वहीं कुछ रेलवे को, तो कुछ पटरियों पर खड़े लोगों को जिम्मेदार ठहरा रहे हैं। अब यहां पर समस्या यह है कि जो मरे, उन्होंने न तो आत्महत्या की है और न ही उनकी हत्या की गई है, सो मौत का जिम्मेदार कौन है? यह अपनी—अपनी परिभाषा के आधार पर तय हो रहा है। 

इस बार एक खास बात, पहले जब भी रेलवे दुर्घटना होती थी, तो रेलवे नैतिक जिम्मेदारी ले लेती थी, नहीं तो इसे एक भूल बता देती थी। लेकिन इस  बार उसने जांच बिठा दी, यानी भई रेलवे तो जिम्मेदारी नहीं लेगी। राज्य सरकार ने भी जांच के आदेश दे दिए, सो वह भी जिम्मेदार नहीं है इसके लिए। आयोजक का कहना है कि उसने तो सिर्फ रावण के  पुतले का दहन किया है, सो वह उसकी मौत का ही जिम्मेदार है। अब यह बात और है कि रामलीला के रावण ने जरूर अपनी जिम्मेदारी निभाते हुए लोगों की जान बचाने में अपने प्राण गंवा दिए। 

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