ये पारिवारिक दंगल, मंगल या अमंगल?

समाजवादी पार्टी से यूपी के सीएम अखिलेश यादव और राम गोपाल यादव के 6 साल के लिए निष्कासित होते ही सबसे बड़ा सवाल ये, ‘‘ये पारिवारिक दंगल आगामी विधानसभा चुनाव के लिए मंगल होगा या अमंगल?’’इन मतभेदों और ताकत की जोर-आजमाइश के बीच कुछ बुनियादी सवाल उठते हैं और इन्हीं सवालों के जवाब में यूपी के इस परिवार की राजनीतिक दांव पेंच की कहानी भी साफ होती है। अब पार्टी का भविष्य क्या होगा इसके बारे में कोई साफ पिक्चर नहीं है। इस बारे में कुछ राजनीतिक पत्रकारों का कहना है कि भले अखिलेश को उनके पिता ने पार्टी से निष्कासित कर दिया हो लेकिन वह अपनी अलग पार्टी नहीं बनाएंगे। शायद यह इस लिए भी संभव है कि सभी जानते है कि सीएम अखिलेश यादव ने एक युवा नेता और अच्छे मुख्यमंत्री के रूप में अपनी छवि बना तो ली है, लेकिन शायद वो पार्टी के स्तर पर संगठन नहीं बना पाए हैं। 

खैर, वरिष्ठ पत्रकार रामदत्त त्रिपाठी के मुताबिक, सीएम अखिलेश यादव पार्टी नहीं छोड़ सकते। इसका सबसे बड़ा कारण हैं जमीनी स्तर पर संगठन अभी भी सपा सुप्रीमो मुलायम सिंह के प्रति साथ है। साथ ही पार्टी के परंपरागत मतदाता जैसे अल्पसंख्यक, यादव और दूसरी पिछड़ी जातियों की निष्ठा भी मुलायम सिंह यादव के प्रति ज्यादा है। त्रिपाठी का कहना है कि अखिलेश यादव जानते हैं कि वो इस बेस को छोड़कर नए युवा मध्यवर्ग के बूते उत्तर प्रदेश में कोई बाजी नहीं जीत सकते हैं। वरिष्ठ पत्रकार शरद प्रधान का मानना है कि अखिलेश के लिए नई पार्टी बनाना आज की तारीख में असंभव है। अखिलेश सीएम तो बन गए लेकिन नेता नहीं बन पाए। जबकि पत्रकार नवीन जोशी का कहना है कि अखिलेश की लड़ाई पार्टी से नहीं बल्कि अपने पिता मुलायम सिंह और अपने चाचा शिवपाल से है। वह आगे कहते वो अपने चाचा को तो दरकिनार कर सकते हैं लेकिन पिता को दरकिनार नहीं कर सकते।

खून का खेलः

असल में देखा जाए तो यह झगड़ा खून का है। इसमें अब देखना यह होगा कि बेटे का खून उबाल मारता है या भाई का। सगा भाई बेटे के बराबर तो नहीं होता है लेकिन बेटे से कम भी नहीं। पत्रकार रामदत्त त्रिपाठी बताते हैं कि जिस जमाने में मुलायम ने संघर्ष किया, इटावा मैनपुरी, फर्रूख़ाबाद, चंबल का इलाका, वहां राजनीति में बहुत बल प्रयोग होता था, गोलीबारी होती थी, मुलायम पर कई बार हमले हुए। बताते है उस जमाने में शिवपाल ने गांव-गांव जाकर काम किया। वहीं शरद प्रधान मानते हैं कि मुलायम को अपने भाई से बेइंतहा प्यार है, लेकिन उम्र का तकाजा उन्हें बेटे की तरफ झुका देता है।

गौर करिये मुलायमसिंह के वंश वाद पर:-

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विधायक और काडर किसके साथ हैं?  पत्रकार रामदत्त त्रिपाठी कहते हैं कि सारे विधायक भी सीएम अखिलेश के साथ नहीं है। मामला बंटा हुआ है। उनके अनुसार दिक्कत ये है कि जिस विधायक की सिफारिश नहीं चलती सरकारी कामों में उसकी राजनीति भी ठीक से नहीं चलती। विधायक मुलायम के प्रति भी निष्ठावान हैं लेकिन चूंकि अखिलेश सरकार में हैं, इसलिए अखिलेश के प्रति उनका झुकाव ज्यादा है।

6 महीने पहले शुरू हुआ झगड़ा यह पारिवारिक झगड़ा छ महीने पहले तब शुरू हुआ था जब जून में मुख्तार अंसारी के कौमी एकता दल के सपा में विलय पर अखिलेश राजी नहीं हुए और शिवपाल ने विलय करा दिया। इसके बाद जब अखिलेश और उनकी वाइफ डिंपल विक्रमादित्य मार्ग के एक सरकारी बंगले में रहने गए तो उद्घाटन में मुलायम सिंह और शिवपाल पहुंचे लेकिन घर की बाकी महिलाएं नहीं आई। इसके बाद यादव परिवार का झगड़ा घर से सड़क पर आ गया। इसके बाद सीएम अखिलेश ने चाचा शिवपाल से कई अहम विभाग छीन लिए इसके बाद यह विवाद और बढ़ता ही गया। इसके बाद अखिलेश को यूपी चीफ की पोस्ट से हटा दिया गया। बाद में अखिलेश के कहने पर अखिलेश को शिवपाल को विभाग लौटाने पड़े। इसके बाद अखिलेश ने दागी मंत्री गायत्री प्रजापति को कैबिनेट से हटा दिया। इसके बाद मुलायम ने दोबारा अखिलेश को बहाल कर दिया। 

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