मध्य प्रदेश चुनाव: क्या भाजपा पर भारी पड़ेगा एससी एसटी एक्ट ?

Sep 03 2018 06:21 PM

भोपाल: मध्य प्रदेश में होने वाले विधानसभा चुनावों में भारतीय जनता पार्टी अपने ही जाल में उलझती नज़र आ रही है, केंद्र स्थित भाजपा ने अनुसूचित जाति/जनजाति के वोट बैंक को हथियाने के लिए एससी-एसटी एक्ट में संशोधन तो करवा दिया है, लेकिन अब मध्य प्रदेश का सवर्ण समुदाय इसके खिलाफ आवाज़ बुलंद कर चुका है. हालात ये हैं कि अब सवर्ण समुदाय भी उग्र प्रदर्शन करने की योजना बना रहा है. 4 सितम्बर को सामान्य, पिछड़ा एवं अल्पसंख्यक वर्ग अधिकारी कर्मचारी संस्था(सपाक्स) ग्वालियर में एक बड़ी रैली कर रही है, साथ ही 6 सितम्बर को इस वर्ग ने भारत बंद का भी ऐलान किया है.

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इससे पहले सवर्ण और अल्पसंख्यक समुदाय के विरोध के कुछ उदहारण भी देखने में आए हैं, सवर्ण समाज के लोगों ने केंद्रीय मंत्री नरेंद्र तोमर के घर का घेराव करते हुए इस्तीफे की मांग भी की थी, थावरचंद्र गहलोत, एमजे अकबर, कांग्रेस नेता कमलनाथ और ज्योतिरादित्य सिंधिया आदि नेता भी लोगों के गुस्से का सामना कर चुके हैं. पिछले 4 दिनों से राज्य के कुछ कस्बों में काले झंडे दिखाए जा रहे हैं और जनप्रतिनिधियों से पूछा जा रहा है कि संशोधन बिल का विरोध क्यों नहीं किया? मध्यप्रदेश के मालवा और ग्वालियर जैसे क्षेत्रों में लोग पोस्टर लगाकर राजनीतिक पार्टियों का विरोध कर रहे हैं, इन पर लिखा है, 'यह घर सामान्य वर्ग का है. कृपया राजनीतिक पर्टियां वोट मांग कर शर्मिंदा न करें, हम अपना वोट सिर्फ नोटा को देंगे.'

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क्या हो सकता है मध्य प्रदेश सरकार पर असर ? राज्य में विधानसभा की कुल 230 सीटें हैं, इनमें 35 सीट अनुसूचित जाति वर्ग तथा 47 सीटें जनजाति वर्ग के लिए आरक्षित हैं, बाकि की 148 सीटों में अन्य वर्ग आते हैं. राज्य में सरकार उसी पार्टी की बनती है. राज्य में बहुमत प्राप्त करने के लिए 116 सीटों की जरूरत होती है. आरक्षित वर्ग की कुल 82 सीटों पर जो भी राजनीतिक दल अपनी पकड़ बना लेता है, अगर इस नज़र से देखा जाए तो बीजेपी की स्थिति राज्य में मजबूत दिखती है, लेकिन सामान्य वर्ग उसके लिए परेशानी खड़ी कर सकता है, सामान्य वर्ग के संगठन सपाक्स की राजनितिक इकाई के अध्यक्ष हीरालाल त्रिवेदी ने सभी सीटों पर उम्मीदवार उतारने की घोषणा की है.  ऐसे में राज्य में त्रिशंकु विधानसभा बनने के आसार हैं. 

ये है सवर्णों की नाराज़गी की मुख्य वजह 

इसी साल मार्च में सुप्रीम कोर्ट ने अनुसूचित जाति एवं जनजाति अत्याचार निवारण अधिनियम के तहत प्राथमिकी दर्ज होने के बाद गिरफ्तार किए जाने के प्रावधान को हटा कर जांच के बाद ही गिरफ्तार किए जाने के लिए कहा था. सुप्रीम कोर्ट के इस आदेश से अनुसूचित जाति वर्ग नाराज हो गया. दो अप्रैल को अनुसूचित जाति वर्ग द्वारा विरोधस्वरूप बंद आयोजित किया था. इस बंद के दौरान मध्यप्रदेश के ग्वालियर एवं चंबल संभाग में बड़े पैमाने पर हिंसा हुई थी. केंद्र सरकार ने इसके बाद ही संसद में एक संशोधन बिल पेश कर जांच किए बगैर गिरफ्तार किए जाने का प्रावधान फिर जोड़ दिया.

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