'भारत तेरे टुकड़े होंगे, इंशाल्लाह..', वाले JNU में अब नहीं होगा धरना प्रदर्शन, राष्ट्र विरोधी नारे लगाए तो खैर नहीं !

नई दिल्ली: राष्ट्रीय राजधानी में स्थित जवाहरलाल नेहरू यूनिवर्सिटी (JNU) में एक बार फिर से नए नियम लागू किए गए हैं। इस नियम के बाद यहां के वामपंथी छात्रों ने विरोध करना शुरू कर दिया है। दरअसल, नए नियम के अनुसार, यूनिवर्सिटी कैंपस में धरना देने पर छात्रों पर 20 हजार का जुर्माना ठोंका जाएगा. इसके अलावा यदि कोई राष्ट्र विरोधी नारे लगाएगा, तो उसे 10 हजार रुपये का जुर्माना भरना होगा।   

 

दरअसल, JNU में विभिन्न मुद्दों पर धरना प्रदर्शन का इतिहास रहा है। कभी वहां संसद पर हमला करने वाले आतंकी अफजल गुरु कि बरसी मनाई जाती है और नारे लगाए जाते हैं कि, 'अफजल हम शर्मिंदा हैं, तेरे कातिल जिन्दा हैं।' यानी सुप्रीम कोर्ट के जिन जजों ने अफजल को फांसी की सजा सुनाई थी, उन्हें एक तरह से 'कातिल' कहा जाता है। कभी वहां, 370 के समर्थन में, तो कभी कश्मीर को आज़ाद करने के लिए मांग की जाती है। कभी LGBTG के समर्थन का आयोजन होता है, तो लड़कियां, लड़कियों को और पुरुष छात्र पुरुषों को चुंबन देकर अपनी समलैंगिकता का इज़हार करते हैं। कभी यूनिवर्सिटी में CAA-NRC के विरोध में प्रदर्शन होते हैं, तो कभी किसी और कारण से। यानी, देखा जाए तो यूनिवर्सिटी में प्रदर्शन अधिकतर राजनितिक होते हैं, जिनका शिक्षा से कोई लेना-देना नहीं होता, हाँ छात्र राजनीति के लिए ये परफेक्ट मंच बन जाता है। 

 

पिछले साल वामपंथ का गढ़ बन चुके JNU की दीवारों पर "फ्री कश्मीर," "भगवा जलेगा" और 'मोदी तेरी कब्र खुदेगी' जैसे नारे लिखे गए थे। वहीं, कुछ महीनों पहले वहां की दीवारों पर  "फ्री फिलिस्तीन," "फ्री कश्मीर" लिखा पाया गया था। यहाँ तक कि, JNU में स्वामी विवेकानंद की प्रतिमा के नीचे भी 'भगवा जलेगा' लिख दिया गया था। इसी JNU में ''फ्री शरजील इमाम'' की मांग भी की गई थी, जो असम को भारत से पूरी तरह काटने की साजिश करने के चलते जेल में है। ये वही यूनिवर्सिटी है, जहाँ ''भारत तेरे टुकड़े होंगे, इंशाल्लाह इंशाल्लाह'' और ''भारत की बर्बादी तक जंग चलेगी'' के नारे लगे थे। आतंकी अफजल गुरु की बरसी मनाने वाले JNU में छत्रपति शिवाजी की तस्वीर फाड़ी गई थी। यहाँ की दीवारों पर ''ब्राह्मण-बनिया भारत छोड़ो'' और ‘ब्राह्मण-बनिया, हम आ रहे हैं बदला लेने, खून बहेगा’ के नारे भी बीते कुछ महीनों में ही देखने को मिले थे। क्या ये सब चीज़ें स्टूडेंट्स की शिक्षा से जुड़ी हैं ? दिल्ली दंगों में पकड़े गए कुछ आरोपित भी इसी JNU के छात्र थे। 

इसलिए एक तरह से देखा जाए, तो JNU में देश विरोधी गतिविधियां बढ़ रहीं थीं। ये सभी काम अभिव्यक्ति की आज़ादी की आड़ में किए जा रहे थे, जिसपर अब प्रशासन ने लगाम लगाने का फैसला लिया है। अब परिसर में धरना प्रदर्शन करने वाले छात्रों पर 20,000 का जुर्माना तय कर दिया गया है और यदि कोई छात्र विश्वविद्यालय के अंदर राष्ट्र विरोधी नारे लगाता पाया जाता है, तो उससे भी 10,000 रुपए का जुर्माना वसूला जाएगा. हालाँकि, कुछ छात्र संगठन प्रशासन के इस आदेश का अभी से विरोध करने लगे हैं, उनका कहना है कि, आवाज़ उठाना हमारा संवैधानिक अधिकार है, तो छीना जा रहा है। वैसे भारतीय संविधान देश के हर नागरिक को अपनी मांग रखने और समाज के लिए आवाज़ उठाने का पूरा अधिकार देता है, लेकिन क्या देश के टुकड़े होने के नारे लगाना, अफजल गुरु की बरसी मनाना, ब्राह्मण-बनिया को देश छोड़ने की धमकी देना, ऐसी चीज़ों को 'अभिव्यक्ति की आज़ादी' की आड़ में बर्दाश्त किया जा सकता है ? छात्र अपनी शिक्षा और अपनी सुविधा के लिए प्रदर्शन करें, देश की भलाई के लिए कुछ मांग करें, तो समझ में आता है, लेकिन एक यूनिवर्सिटी में इस तरह के नारों का क्या काम ?

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