ताबूत को तरसते शहीदों के शव

यह हमारे देश की विडम्बना ही है, कि जब कोई विवाद अदालत की चौखट पर पहुँच जाता है, तो उसका जल्द समाधान नहीं हो पाता. इसका खामियाजा सभीको भुगतना पड़ता है. हाल ही में अरुणाचल प्रदेश में वायुसेना के मिग 17 हेलीकॉप्टर दुर्घटना में मारे गए सात जवानों के शवों को गत्ते और प्लास्टिक में पैक किए जाने की खूब आलोचना भी हुई थी. जब इस मामले की पड़ताल  में चौंकाने वाली बात सामने आई. ताबूत खरीदी का 18 साल पहले का मामला अदालत में विचाराधीन होने से ही शहीद जवानों के शवों को ले जाने के लिए अब तक ना तो ताबूत मिले हैं और हैं ना ही बैग पैक.

गौरतलब है कि 1999 में ऑपरेशन विजय के बाद पहली बार ताबूत और बैगपैक की मांग उठी थी. तब  रक्षा मंत्रालय ने पहली बार इसका अनुबंध कर करीब 900 बैगपैक और 150 ताबूत की जरूरत बताई थी. तब 18 किलोग्राम वजन के ताबूत मांगे गए थे, लेकिन आपूर्ति के समय इसका वजन 55 किलोग्राम हो गया था.इस मामले की सीबीआई जाँच भी हुई. यहां तक की तत्कालीन रक्षा मंत्री जॉर्ज फर्नांडीज को अपना त्यागपत्र देना पड़ा था.2001 में इस अनुबंध को रद्द कर दिया.2013 में सीबीआई ने भी क्लीन चिट दे दी.लेकिन तब से सेना एक भी ताबूत या बैग पैक नहीं खरीद पाई .

इसका कारण एक ऑडिटर की अपील फ़ाइल करने को माना गया. जिसमें उसने ये पता लगाने की मांग की, कि जब भारत को ये ताबूत दिए गए, तो अमेरिका को उस समय ये किस क़ीमत पर दिए गए थे. हालाँकि मार्च 2017 में कोर्ट ने आदेश देकर सेना को इन सभी ताबूतों और बैगपैक को ले जाने की अनुमति दे दी थी, लेकिन ऑडिटर की नई अपील के बाद इस मामले में एक बार फिर रोक लग गई है.अभी भी हालात यह हैं कि देश के लिए अपनी जान देने वाले शहीदों के शव ताबूत को तरस रहे हैं.

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