आरुषि हत्याकांड के केस में असफल रही सीबीआई

नई दिल्ली: आरुषि हत्या कांड के आरोप में 9 साल पहले आरुषि के माता - पिता, राजेश और नुपुर तलवार को जेल में बंद कर दिया था, जिन्हे कल  हाई कोर्ट ने रिहा कर दिया है, जिसकी सबसे बड़ी वजह यह रही है कि देश की सबसे बड़ी जांच एजेंसी दोहरे हत्याकांड की गुत्थी को सुलझाने में पूरी तरह नाकाम रही, ढाई साल की जांच और कई उलटफेर के बाद आखिरकार सीबीआई ने अपने हाथ खड़े कर दिए,और अदालत से केस को बंद करने की अपील की. 

इस हत्याकांड की पूरी कहानी शराब के गिलास पर लगे उंगली के एक निशान पर आकर टिक गई थी. जिस गिलास पर आरुषि और हेमराज दोनों के खून से सनी उंगली के निशान थे. यानी जिसने भी शराब पी थी, उसी ने दोनों की हत्या की थी और हत्या करने के बाद भी वह शख्स घर में मौजूद था. लेकिन सीबीआइ कड़ी मेहनत के बावजूद भी गिलास में लगे उंगली के निशान वाले शख्स की तलाश नहीं कर पाई. सीबीआइ की माने तो हत्याकांड के बाद उत्तरप्रदेश पुलिस की लापरवाही के कारण सबूतों के साथ हुए छेड़छाड़ ने इस केस की गुत्थी को जटिल बना दिया. इस हत्याकांड को सुलझाने में असमर्थता रही सीबीआइ की क्षमता और कार्यशैली पर भी सवालिया निशान है, ढाई साल के दौरान सीबीआइ अपने ही जांच के निष्कर्षो से पलटती रही.

जांच की कमान सबसे पहले एक जून 2008 को सीबीआइ के तत्कालीन संयुक्त निदेशक अरुण कुमार ने संभाली और 10 दिन के भीतर ही उन्होंने तीन नौकरों कृष्णा, राजकुमार और विजय मंडल को इसके लिए जिम्मेदार ठहराते हुए उन्हें गिरफ्तार कर लिया था. लेकिन बाद में उनके खिलाफ कोई पुख्ता सबूत नहीं मिला पाया तो उन्हें रिहा कर दिया गया, जिसके बाद सीबीआई अफसर नीलाभ किशोर ने शुरू से जाँच की और उनकी सुई आरुषि के माता पिता पर जा कर रुकी. हालांकि वो भी इस हत्याकांड की गुत्थी को सुझाने में असर्मथ रहे और आखिरकार आरुषि के माता पिता को 9 साल तक जेल की हवा खाने के बाद रिहा हो गए       इस मामले पर एक वरिष्ठ अधिकारी ने बताया कि, उनके पास कोई रास्ता भी नहीं बचा था. उन्होंने कहा कि संदेह के घेरे में राजेश तलवार और उसके तीनों नौकर भी हैं. लेकिन इनमें से किसी के खिलाफ कोई ठोस सबूत नहीं मिल पाया. उन्होंने स्वीकार किया की जांच से जुड़ा कोई भी अधिकारी नहीं जानता है कि आखिरकार आरुषि और हेमराज की हत्या किसने की.

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