भारत में गले व मुंह के कैंसर रोगी बढ़ रहे है !

Jul 27 2016 02:16 PM

नई दिल्ली : भारत में मुंह और गले के कैसंर से मरने वालों की संख्या में लगातार बढ़ोतरी हो रही है। हर वर्ष इससे 10 लाख लोग पीड़ित हो रहे है। इनमें से आधे से अधिक की मौत तो बीमारी को बिना पहचाने ही हो जाती है। वायस ऑफ टोबैको विक्टिमस (वीओटीवी) ने एशियन पेसिफिक जनरल ऑफ कैंसर प्रिवेंशन द्वारा जारी रिपोर्ट के आधार पर यह खुलासा किया है।

वीओटीवी के संरक्षक डॉ टी पी साहू ने बताया कि सुविधाओं के अबाव में लोग मर रहे है। 30 साल पहले तक 60-70 की उम्र में गले और मुंह का कैंसर होता था, लेकिन आज 30 से 50 साल में ही यह बीमारी हो जाती है। भारत में विश्व की तुलना में धुआंरहित चबाने वाले तंबाकू उत्पाद (जर्दा, गुटखा, खैनी) का सेवन सबसे अधिक होता है।

यह सस्ता और आसानी से मिलने वाला नशा है। पिछले दो दशकों में इसका प्रयोग बढ़ा है, जिसके कारण भी सिर व गले के कैंसर के रोगी बढ़े हैं। डॉ़ साहू ने कहा कि इंडियन काउंसिल ऑफ मेडिकल रिसर्च (आईसीएमआर) द्वारा वर्ष 2008 में प्रकाशित अनुमान के मुताबिक, भारत में सिर व गले के कैंसर के मामलों में वृद्धि देखी जा रही है।

इन मामलों में 90 फीसदी कैंसर तंबाकू, शराब व सुपारी के सेवन से होते हैं और इस प्रकार के कैंसर की रोकथाम की जा सकती है। आईसीएमआर की रिपोर्ट के अनुसार, पुरुषों में 50 फीसदी और महिलाओं में 25 फीसदी कैंसर के यही कारण है। टाटा मेमोरियल हॉस्पिटल के कैंसर सर्जन डॉ पंकज चतुर्वेदी का कहना है कि सिर व गले के कैंसर के नियंत्रण के लिए सरकारों, एनजीओ, चिकित्सा व स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं, सामाजिक संगठनों, शिक्षा व उद्योग संस्थानों सहित सभी के सहयोग की आवश्यकता है।

2016 में प्रकाशित शोधपत्र के अनुसार, 2001 में पुरुषों में मुंह का कैंसर के मामले 42,725 वहीं 2016 में 65,205 थे, वहीं महिलाओं में 22,080 व 35,088 मामले सामने आए। 2014 में जॉन हॉपकिंस यूनिवर्सिटी ब्लूमबर्ग स्कूल ऑफ पब्लिक हेल्थ व विश्व स्वास्थ्य संगठन ने गुटका प्रतिबंध के प्रभावों पर एक अध्यन कराया। इस अध्ययन में 99 फीसदी लोगों ने कहा कि भारतीय युवाओं के स्वास्थय के लिए प्रतिबंध सबसे अच्छा है। 80 फीसदी लोगों का विश्वास है कि प्रतिबंध ने ही उनसे गुटका छुड़वाया।

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